Wednesday, March 1, 2023

बाल कहानी - मैक्स और उसका रोबोट

 

उपासना बेहार


Courtesy-Google.com


 

मैक्स के कई रिश्तेदार विदेशों में रहते थे. जब भी वो मैक्स के घर आते थे तो उसे वहाँ से लाये खिलौने गिफ्ट में देते. मैक्स के घर के पास ही एक खेल का मैदान था, वहां अन्य बच्चे भी खेलेने आते थे. मैक्स रोज अलग अलग खिलौने लेकर वहाँ जाता और अकेले खेलता. शुरू शुरू में बच्चों ने मैक्स से खेलने के लिए खिलौने मांगे लेकिन उसने सभी बच्चों को डांटा और खिलौने छूने से मना कर दिया. उसने जोर से कहा कोई भी मेरे खिलौनों को हाथ नहीं लगाएगा, ये सब महंगे हैं और विदेशी है, तुम लोग क्या जानो इनके साथ कैसे खेलते हैं, खराब कर दोगे. धीरे धीरे बच्चों ने उसके साथ खेलना बंद कर दिया लेकिन मैक्स को इससे कोई फर्क भी नहीं पड़ा. उसे तो खिलौनों को दिखा कर दूसरे बच्चों को जलाने में मजा आता.

एक दिन अमरीका से मैक्स के चाचा-चाची आये. वो अपने साथ एक छोटा रोबोट लाये थे. रोबोट के अंदर जिस व्यक्ति की भी आवाज डाल दी जाए वो उसी का कहा मानता था. रोबोट में मैक्स की आवाज डाल दी गयी. आदत के अनुसार मैक्स रोबोट को लेकर खेल के मैदान पहुँच गया और रोबोट से जो करतब दिखाने को कहता वो वही करतब करता. सभी बच्चे आश्चर्य चकित हो कर दूर से उसे देख रहे थे. करतब दिखाते दिखाते अचानक रोबोट पास के एक संकरे गड्ढे में गिर गया  और अन्दर फंस गया. मैक्स ने रोबोट को बाहर निकालने की कई बार कोशिश की लेकिन रोबोट को बाहर नहीं निकाल पाया. मैक्स जोर जोर से रोने लगा, वो जानता था कि अगर रोबोट के बिना घर गया तो उसके पापा डाटेंगें. पापा ने मैक्स को मना किया था कि घर पर ही इसके साथ खेलो लेकिन वो तो बच्चों को जलाना चाहता था.

बच्चे अपने घर जाने लगें. तभी उन्होंने देखा कि मैक्स जोर जोर से रो रहा है. वसीम ने पूछा मैक्स तुम रो क्यों रहे हो? मेरा रोबोट इस गड्ढे में गिर गया है. मैंने कई बार कोशिश की पर उसे बाहर निकाल नहीं सका. समझ नहीं आ रहा कि उसे कैसे बाहर निकाला जाए.  

वसीम ने दिमाग लगाया और कहा मैं तुम्हारा रोबोट गड्ढे से निकाल सकता हूँ.

कैसे?

हम तुम्हारे रोबोट को चुम्बक से निकालेगें. अनुराग तुम्हारे घर बड़ा वाला चुम्बक रखा है उसे और रस्सी लेकर आओ.वासिम ने कहा.

मैदान के सामने ही अनुराग का घर था वो तुरंत अपने घर गया और चुम्बक के साथ मजबूत रस्सी ले आया. वसीम ने चुम्बक को रस्सी से बाँधा और उसे गड्ढे के अंदर डाला. रोबोट तुरंत चुम्बक से चिपक गया. वसीम ने रस्सी को सावधानी से ऊपर की तरफ खींचा और चुम्बक से चिपका रोबोट भी बाहर आ गया. मैक्स बहुत खुश हो गया. उसने वसीम को गले लगा लिया और अपने घर चला गया.

दूसरे दिन वो अपने सारे खिलौने ले कर खेल के मैदान में आया और सभी बच्चों को कहा कि आज से हम सब मिल कर खिलौने खेलेगें क्योंकि मिलकर खेलने में ज्यादा मजा आता है. फिर सभी बच्चे खिलौने से खेलने लगे.

ई मेल – upasanabehar@gmail.com

 

 


 

उपासना बेहार


Courtesy-Google.com


 

मैक्स के कई रिश्तेदार विदेशों में रहते थे. जब भी वो मैक्स के घर आते थे तो उसे वहाँ से लाये खिलौने गिफ्ट में देते. मैक्स के घर के पास ही एक खेल का मैदान था, वहां अन्य बच्चे भी खेलेने आते थे. मैक्स रोज अलग अलग खिलौने लेकर वहाँ जाता और अकेले खेलता. शुरू शुरू में बच्चों ने मैक्स से खेलने के लिए खिलौने मांगे लेकिन उसने सभी बच्चों को डांटा और खिलौने छूने से मना कर दिया. उसने जोर से कहा कोई भी मेरे खिलौनों को हाथ नहीं लगाएगा, ये सब महंगे हैं और विदेशी है, तुम लोग क्या जानो इनके साथ कैसे खेलते हैं, खराब कर दोगे. धीरे धीरे बच्चों ने उसके साथ खेलना बंद कर दिया लेकिन मैक्स को इससे कोई फर्क भी नहीं पड़ा. उसे तो खिलौनों को दिखा कर दूसरे बच्चों को जलाने में मजा आता.

एक दिन अमरीका से मैक्स के चाचा-चाची आये. वो अपने साथ एक छोटा रोबोट लाये थे. रोबोट के अंदर जिस व्यक्ति की भी आवाज डाल दी जाए वो उसी का कहा मानता था. रोबोट में मैक्स की आवाज डाल दी गयी. आदत के अनुसार मैक्स रोबोट को लेकर खेल के मैदान पहुँच गया और रोबोट से जो करतब दिखाने को कहता वो वही करतब करता. सभी बच्चे आश्चर्य चकित हो कर दूर से उसे देख रहे थे. करतब दिखाते दिखाते अचानक रोबोट पास के एक संकरे गड्ढे में गिर गया  और अन्दर फंस गया. मैक्स ने रोबोट को बाहर निकालने की कई बार कोशिश की लेकिन रोबोट को बाहर नहीं निकाल पाया. मैक्स जोर जोर से रोने लगा, वो जानता था कि अगर रोबोट के बिना घर गया तो उसके पापा डाटेंगें. पापा ने मैक्स को मना किया था कि घर पर ही इसके साथ खेलो लेकिन वो तो बच्चों को जलाना चाहता था.

बच्चे अपने घर जाने लगें. तभी उन्होंने देखा कि मैक्स जोर जोर से रो रहा है. वसीम ने पूछा मैक्स तुम रो क्यों रहे हो? मेरा रोबोट इस गड्ढे में गिर गया है. मैंने कई बार कोशिश की पर उसे बाहर निकाल नहीं सका. समझ नहीं आ रहा कि उसे कैसे बाहर निकाला जाए.  

वसीम ने दिमाग लगाया और कहा मैं तुम्हारा रोबोट गड्ढे से निकाल सकता हूँ.

कैसे?

हम तुम्हारे रोबोट को चुम्बक से निकालेगें. अनुराग तुम्हारे घर बड़ा वाला चुम्बक रखा है उसे और रस्सी लेकर आओ.वासिम ने कहा.

मैदान के सामने ही अनुराग का घर था वो तुरंत अपने घर गया और चुम्बक के साथ मजबूत रस्सी ले आया. वसीम ने चुम्बक को रस्सी से बाँधा और उसे गड्ढे के अंदर डाला. रोबोट तुरंत चुम्बक से चिपक गया. वसीम ने रस्सी को सावधानी से ऊपर की तरफ खींचा और चुम्बक से चिपका रोबोट भी बाहर आ गया. मैक्स बहुत खुश हो गया. उसने वसीम को गले लगा लिया और अपने घर चला गया.

दूसरे दिन वो अपने सारे खिलौने ले कर खेल के मैदान में आया और सभी बच्चों को कहा कि आज से हम सब मिल कर खिलौने खेलेगें क्योंकि मिलकर खेलने में ज्यादा मजा आता है. फिर सभी बच्चे खिलौने से खेलने लगे.

ई मेल – upasanabehar@gmail.com

 

 


Tuesday, January 31, 2023

पुस्तक समीक्षा : जीवन में संविधान

 

उपासना बेहार



किसी भी देश का संविधान उस देश की आत्मा होती है, इसी के अनुरूप ही देश की शासन व्यवस्था संचालित होती है. जिस तरह ध्रुव तारे को देख कर यात्री अपना मार्ग तय करते हैं उसी तरह संविधान भी हमेशा देश संचालन में मार्गदर्शन का काम करता है. यह विधायका, न्यायपालिका, कार्यपालिका के गठन, कार्य, शक्ति, जवाबदेहिता, जिम्मेदारीयों को निर्धारित करता ही है साथ ही नागरिकों के हक़-कर्तव्यों को सुनिश्चित करता है. 15 अगस्त 1947 को जब देश आजाद हुआ था तब देश के नेतृत्वकर्ताओं के सामने सबसे बड़ा प्रश्न खड़ा था कि यह देश कैसे चलेगा, किस दिशा में आगे बढ़ेगा, कौन से नियम-कायदे होंगे, क्या अधिकार-जिम्मेदारियां होंगी, देश को आगे बढ़ाने के लिए धनराशि की व्यवस्था, पड़ोसी मुल्कों के साथ सम्बन्ध-व्यवहार किस तरह किया जाएगा, समाज और नागरिक किन मापदंडों पर चलेंगे, इस तरह के अनेकों सवाल उभर कर आने लगे. इन्ही सवालों के जवाबों के लिए भारतीय संविधान सभा का गठन किया गया और संविधान निर्माण की जिम्मेदारी सौपी गयी. सभा की प्रारूप समिति (अध्यक्ष डॉ भीमराव आंबेडकर) द्वारा भारत के संविधान का मसौदा तैयार किया गया जिस पर विस्तृत चर्चा, बहस, विचार-विमर्श करते हुए संविधान को देश में 26 जनवरी 1950 से लागू किया गया.

हमारे संविधान का सार उसके उद्देशिका में है, जिसमें भारत को सम्पूर्ण प्रभुत्वसंपन्न, समाजवादी, पंथ निरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने का सपना है, वही देश के सभी नागरिकों के लिए सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय, समानता, गरिमा-सम्मान, एकता-अखण्डता, समरसता, बंधुत्व, कर्तव्य की बात करता है साथ ही हर नागरिक को विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता भी प्रदान करता है. संविधान ही यह बतलाता है कि समाज कैसे व्यवहार करेगा, प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य होगा कि वह देश के सभी व्यक्ति की मान-सम्मान या भावना का ख्याल रखे. अपने व्यवहार द्वारा किसी के अधिकारों का हनन या तकलीफ न हो. डॉ. भीमराव आंबेडकर ने कहा भी था, "संविधान केवल वकीलों का दस्तावेज नहीं है, बल्कि जीवन जीने का एक माध्यम है."

लेखक सचिन कुमार जैन की किताब ‘जीवन में संविधान’ में यही बताया गया है कि संविधान में इंगित ये सभी केवल शब्द नहीं है बल्कि हमारे जीवन के हर पहलू में शामिल हैं. उन्होंने इस किताब के माध्यम से ये बताने का प्रयास किया है कि संविधान में वर्णित हर शब्द जीवन के कितने अन्दर तक समाहित है. इस किताब में छिहत्तर लघु कहानियाँ है, असल में ये कहानियाँ नहीं हैं बल्कि किसी न किसी के साथ हुई सच्ची घटनायें हैं जिसे कहानी के माध्यम से किताब में बया किया गया है. लेखक ने इन सभी घटनाओं को बहुत ही सरल भाषा में कहानी में ढाला है. इन कहानियों के जीवंत पात्र बच्चे हैं, महिलाएं हैं, किशोर/किशोरियां हैं, युवा हैं, बुजुर्ग हैं, दलित हैं, आदिवासी है, गरीब हैं, वंचित तबकों से हैं.

जब आप इन कहानियों को पढ़ते हैं तो पाते हैं कि हर कहानी में कही न कही संविधान में प्रदत किसी न किसी मूल्य का उल्लंघन हुआ है. कई कहानियों में सरकार द्वारा बनाये गए कानूनों का स्पष्ट उल्लेख किया गया है और उनके अवमानना पर बात की गयी है. जब आप किसी कहानी को पढ़ते हैं और जैसे जैसे कहानी में आगे बढ़ते जाते हैं वैसे-वैसे वो आपको झंझोड़ती है, अपने अन्दर झाँकने को प्रेरित करती हैं.  प्रत्येक कहानियों का अंत लेखक द्वारा सवालों के साथ किया गया है. इस सवालों का जवाब हम सभी भारत के नागरिकों को ही देना होगा. किताब में गरिमापूर्ण जीवन, स्वतंत्रता, भाईचारे, हिंसा, छुआछुत, धर्म, असमानता, बंधुत्व, स्त्री स्वतंत्रता, राईट टू चाइस, आर्थिक विषमता, जेंडर आदि विषयों से घटित सच्ची घटनाओं को उठाया गया है.

आजादी के इतने सालों बाद भी संविधान के मूल्यों को समाज के द्वारा आत्मसात नहीं किया गया है और अब भी हमारे देश में जाति, लिंग, धर्म और आर्थिक आधार पर भेदभाव है, जो जीवन की रोजमर्रा के मामलों में परिलक्षित होती हैं जैसे एक कहानी में दलित व्यक्ति बर्तन में रखे पीने के पानी को स्वंय से निकालने की हिम्मत नहीं कर पाता है, या एक अन्य कहानी में जब दलित व्यक्ति कमरे से गुजरता है तो चप्पल पहन कर नहीं अपने हाथ में ले कर कमरा पार करता है. इस तरह की घटनाएँ आये दिन हमारे सामने आती हैं जिसमें दलित समुदाय को कुएं से पानी नहीं भरने दिया जाता या जब वो उच्च जाति के घरों/गलियों के सामने से निकलते हैं तो चप्पल नहीं पहनते हैं. एक और कहानी है जिसमें धर्म के आधार पर भेदभाव को रेखांकित किया गया है जिसमें मुस्लिम डिलिवरी बॉय के साथ इस तरह का वाकया हुआ था. हम देख रहे हैं कि पिछले कुछ सालों से धार्मिक भेदभाव और नफरत ख़त्म होने के बदले बढ़ी ही है. आज अंतर्धार्मिक विवाह को लव जिहाद के रूप में परिभाषित किया जा रहा है, किताब की एक कहानी इसे उजागर करती है. इसी तरह महिलाओं के स्वतंत्रता, रुढ़िवादी परम्पराओं जैसे बाल विवाह, झगड़ा तोड़ो प्रथा आदि को लेकर भी आये दिन होने वाली घटनाओं का जिक्र है.

यह बड़ी विडंबना है कि आजादी के इतने साल गुजर जाने के बाद भी वंचित तबकों की मूलभूत आवश्कताएं जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य तक पहुँच नहीं हो पा रही है. एक कहानी मध्यप्रदेश के सतना जिले के गावं की एक गर्भवती महिला की स्वास्थ्य सेवाओं की सुविधा न मिलने के कारण सड़क पर ही प्रसव हो जाने की है. बच्चे शिक्षा के बदले बाल मजदूरी की तरफ ढकेल दिए जा रहे हैं. एक कहानी में हिंसा के बढ़ते मामले और असुरक्षित माहौल के चलते लड़कियों की पढाई अधूरी रह जाती है, को इंगित किया गया है. जहाँ एक और ये सभी व्याकुल करने वाली कहानियां हैं तो वही लोगों के संघर्ष की भी दास्ता है, हार न मानने वाले लोगों की कहानियाँ हैं, बेहतर समाज और स्थितियों के सपने देखने और प्रयास करने वाले लोगों की भी कथाएं शामिल हैं.

‘जीवन में संविधान’ किताब के लेखक सचिन कुमार जैन पिछले 25 सालों से समाज के मूलभूत विषयों पर अन्य सामाजिक संस्थाओं के साथ मिलकर शिक्षण-प्रशिक्षण, शोध, लेखन और मैदानी काम करते आ रहे हैं. वर्तमान में वे सामाजिक नागरिक संस्था ‘विकास संवाद’ के संस्थापक सचिव के रूप में कार्यरत हैं. उनकी अभी तक 67 पुस्तक-पुस्तिकाएं, मार्गदर्शिकाएं प्रकाशित हो चुकी हैं. विगत कई वर्षों से वो संविधान के मूल्यों के प्रचार-प्रसार के लिए लगातार प्रयत्न कर रहे हैं और इसके विभिन्न पहलू पर लिखते आ रहे हैं. संविधान पर उनकी पूर्व में दो किताबें ‘भारतीय संविधान की विकास गाथा’ और ‘संविधान और हम’ प्रकाशित हो चुकी है.

इस किताब को अवश्य पढ़ा जाना चाहिए क्योंकि ये असंवेदनशील होते समाज/लोगों में संवेदनशीलता जगाती है और अपने आप को उन लोगों की जगह पर रखकर सोचने को मजबूर करती है जिनके अधिकारों का लगातार हनन होता आ रहा है. इस किताब को अंतिका प्रकाशन, गाजियाबाद द्वारा प्रकाशित किया गया है, जिसका मूल्य 250 रूपये है.

 

 

उपासना बेहार



किसी भी देश का संविधान उस देश की आत्मा होती है, इसी के अनुरूप ही देश की शासन व्यवस्था संचालित होती है. जिस तरह ध्रुव तारे को देख कर यात्री अपना मार्ग तय करते हैं उसी तरह संविधान भी हमेशा देश संचालन में मार्गदर्शन का काम करता है. यह विधायका, न्यायपालिका, कार्यपालिका के गठन, कार्य, शक्ति, जवाबदेहिता, जिम्मेदारीयों को निर्धारित करता ही है साथ ही नागरिकों के हक़-कर्तव्यों को सुनिश्चित करता है. 15 अगस्त 1947 को जब देश आजाद हुआ था तब देश के नेतृत्वकर्ताओं के सामने सबसे बड़ा प्रश्न खड़ा था कि यह देश कैसे चलेगा, किस दिशा में आगे बढ़ेगा, कौन से नियम-कायदे होंगे, क्या अधिकार-जिम्मेदारियां होंगी, देश को आगे बढ़ाने के लिए धनराशि की व्यवस्था, पड़ोसी मुल्कों के साथ सम्बन्ध-व्यवहार किस तरह किया जाएगा, समाज और नागरिक किन मापदंडों पर चलेंगे, इस तरह के अनेकों सवाल उभर कर आने लगे. इन्ही सवालों के जवाबों के लिए भारतीय संविधान सभा का गठन किया गया और संविधान निर्माण की जिम्मेदारी सौपी गयी. सभा की प्रारूप समिति (अध्यक्ष डॉ भीमराव आंबेडकर) द्वारा भारत के संविधान का मसौदा तैयार किया गया जिस पर विस्तृत चर्चा, बहस, विचार-विमर्श करते हुए संविधान को देश में 26 जनवरी 1950 से लागू किया गया.

हमारे संविधान का सार उसके उद्देशिका में है, जिसमें भारत को सम्पूर्ण प्रभुत्वसंपन्न, समाजवादी, पंथ निरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने का सपना है, वही देश के सभी नागरिकों के लिए सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय, समानता, गरिमा-सम्मान, एकता-अखण्डता, समरसता, बंधुत्व, कर्तव्य की बात करता है साथ ही हर नागरिक को विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता भी प्रदान करता है. संविधान ही यह बतलाता है कि समाज कैसे व्यवहार करेगा, प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य होगा कि वह देश के सभी व्यक्ति की मान-सम्मान या भावना का ख्याल रखे. अपने व्यवहार द्वारा किसी के अधिकारों का हनन या तकलीफ न हो. डॉ. भीमराव आंबेडकर ने कहा भी था, "संविधान केवल वकीलों का दस्तावेज नहीं है, बल्कि जीवन जीने का एक माध्यम है."

लेखक सचिन कुमार जैन की किताब ‘जीवन में संविधान’ में यही बताया गया है कि संविधान में इंगित ये सभी केवल शब्द नहीं है बल्कि हमारे जीवन के हर पहलू में शामिल हैं. उन्होंने इस किताब के माध्यम से ये बताने का प्रयास किया है कि संविधान में वर्णित हर शब्द जीवन के कितने अन्दर तक समाहित है. इस किताब में छिहत्तर लघु कहानियाँ है, असल में ये कहानियाँ नहीं हैं बल्कि किसी न किसी के साथ हुई सच्ची घटनायें हैं जिसे कहानी के माध्यम से किताब में बया किया गया है. लेखक ने इन सभी घटनाओं को बहुत ही सरल भाषा में कहानी में ढाला है. इन कहानियों के जीवंत पात्र बच्चे हैं, महिलाएं हैं, किशोर/किशोरियां हैं, युवा हैं, बुजुर्ग हैं, दलित हैं, आदिवासी है, गरीब हैं, वंचित तबकों से हैं.

जब आप इन कहानियों को पढ़ते हैं तो पाते हैं कि हर कहानी में कही न कही संविधान में प्रदत किसी न किसी मूल्य का उल्लंघन हुआ है. कई कहानियों में सरकार द्वारा बनाये गए कानूनों का स्पष्ट उल्लेख किया गया है और उनके अवमानना पर बात की गयी है. जब आप किसी कहानी को पढ़ते हैं और जैसे जैसे कहानी में आगे बढ़ते जाते हैं वैसे-वैसे वो आपको झंझोड़ती है, अपने अन्दर झाँकने को प्रेरित करती हैं.  प्रत्येक कहानियों का अंत लेखक द्वारा सवालों के साथ किया गया है. इस सवालों का जवाब हम सभी भारत के नागरिकों को ही देना होगा. किताब में गरिमापूर्ण जीवन, स्वतंत्रता, भाईचारे, हिंसा, छुआछुत, धर्म, असमानता, बंधुत्व, स्त्री स्वतंत्रता, राईट टू चाइस, आर्थिक विषमता, जेंडर आदि विषयों से घटित सच्ची घटनाओं को उठाया गया है.

आजादी के इतने सालों बाद भी संविधान के मूल्यों को समाज के द्वारा आत्मसात नहीं किया गया है और अब भी हमारे देश में जाति, लिंग, धर्म और आर्थिक आधार पर भेदभाव है, जो जीवन की रोजमर्रा के मामलों में परिलक्षित होती हैं जैसे एक कहानी में दलित व्यक्ति बर्तन में रखे पीने के पानी को स्वंय से निकालने की हिम्मत नहीं कर पाता है, या एक अन्य कहानी में जब दलित व्यक्ति कमरे से गुजरता है तो चप्पल पहन कर नहीं अपने हाथ में ले कर कमरा पार करता है. इस तरह की घटनाएँ आये दिन हमारे सामने आती हैं जिसमें दलित समुदाय को कुएं से पानी नहीं भरने दिया जाता या जब वो उच्च जाति के घरों/गलियों के सामने से निकलते हैं तो चप्पल नहीं पहनते हैं. एक और कहानी है जिसमें धर्म के आधार पर भेदभाव को रेखांकित किया गया है जिसमें मुस्लिम डिलिवरी बॉय के साथ इस तरह का वाकया हुआ था. हम देख रहे हैं कि पिछले कुछ सालों से धार्मिक भेदभाव और नफरत ख़त्म होने के बदले बढ़ी ही है. आज अंतर्धार्मिक विवाह को लव जिहाद के रूप में परिभाषित किया जा रहा है, किताब की एक कहानी इसे उजागर करती है. इसी तरह महिलाओं के स्वतंत्रता, रुढ़िवादी परम्पराओं जैसे बाल विवाह, झगड़ा तोड़ो प्रथा आदि को लेकर भी आये दिन होने वाली घटनाओं का जिक्र है.

यह बड़ी विडंबना है कि आजादी के इतने साल गुजर जाने के बाद भी वंचित तबकों की मूलभूत आवश्कताएं जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य तक पहुँच नहीं हो पा रही है. एक कहानी मध्यप्रदेश के सतना जिले के गावं की एक गर्भवती महिला की स्वास्थ्य सेवाओं की सुविधा न मिलने के कारण सड़क पर ही प्रसव हो जाने की है. बच्चे शिक्षा के बदले बाल मजदूरी की तरफ ढकेल दिए जा रहे हैं. एक कहानी में हिंसा के बढ़ते मामले और असुरक्षित माहौल के चलते लड़कियों की पढाई अधूरी रह जाती है, को इंगित किया गया है. जहाँ एक और ये सभी व्याकुल करने वाली कहानियां हैं तो वही लोगों के संघर्ष की भी दास्ता है, हार न मानने वाले लोगों की कहानियाँ हैं, बेहतर समाज और स्थितियों के सपने देखने और प्रयास करने वाले लोगों की भी कथाएं शामिल हैं.

‘जीवन में संविधान’ किताब के लेखक सचिन कुमार जैन पिछले 25 सालों से समाज के मूलभूत विषयों पर अन्य सामाजिक संस्थाओं के साथ मिलकर शिक्षण-प्रशिक्षण, शोध, लेखन और मैदानी काम करते आ रहे हैं. वर्तमान में वे सामाजिक नागरिक संस्था ‘विकास संवाद’ के संस्थापक सचिव के रूप में कार्यरत हैं. उनकी अभी तक 67 पुस्तक-पुस्तिकाएं, मार्गदर्शिकाएं प्रकाशित हो चुकी हैं. विगत कई वर्षों से वो संविधान के मूल्यों के प्रचार-प्रसार के लिए लगातार प्रयत्न कर रहे हैं और इसके विभिन्न पहलू पर लिखते आ रहे हैं. संविधान पर उनकी पूर्व में दो किताबें ‘भारतीय संविधान की विकास गाथा’ और ‘संविधान और हम’ प्रकाशित हो चुकी है.

इस किताब को अवश्य पढ़ा जाना चाहिए क्योंकि ये असंवेदनशील होते समाज/लोगों में संवेदनशीलता जगाती है और अपने आप को उन लोगों की जगह पर रखकर सोचने को मजबूर करती है जिनके अधिकारों का लगातार हनन होता आ रहा है. इस किताब को अंतिका प्रकाशन, गाजियाबाद द्वारा प्रकाशित किया गया है, जिसका मूल्य 250 रूपये है.

 

Monday, January 30, 2023

सावित्री बाई फुले और वर्तमान में बालिका शिक्षा

 उपासना बेहार 

Image Courtesy -Google.com

सावित्रीबाई फुले भारत की प्रथम महिला शिक्षिका, प्रथम शिक्षाविद्, समाज सुधारक और मराठी लेखक व कवियत्री थीं. उन्होंने उन्नीसवीं सदी में अपने पति ज्योतिराव गोविंदराव फुले के साथ मिलकर शिक्षा के क्षेत्र के साथ साथ स्त्री अधिकारों, छुआछुत, सतीप्रथा, विधवाविवाह, बालविवाह, अंधविश्वास, के खिलाफ संघर्ष किया. सावित्रीबाई का जन्म 3 जनवरी 1831 को महाराष्ट्र के सतारा जिले के नायगांव गॉव में हुआ था. 9 साल की आयु में उनकी शादी ज्योतिबा फुले के साथ हुई. जब विवाह हुआ था उस समय तक उनको स्कूली शिक्षा नहीं मिली थी. उनके पिता का मानना था कि शिक्षा का अधिकार केवल उच्च जाति के पुरुषों को ही था. जबकि उनके पति ज्योतिराव फुले की सोच थी कि दलित और महिलाओं की आत्मनिर्भरता, शोषण से मुक्ति और विकास के लिए सबसे जरुरी है शिक्षा. उन्होंने इसी सोच को जमीनी हकीकत में उतारने की शुरुआत सावित्रीबाई फुले को शिक्षित करने से की.

सावित्रीबाई ने ज्योतिबा के साथ मिल कर 1848 में पुणे में बालिका विद्यालय की स्थापना की, जिसमें दबी-पिछड़ी जातियों के बच्चे, विशेषकर लड़कियाँ की संख्या ज्यादा थी. सावित्रीबाई का रोज घर से विद्यालय जाने का सफ़र बहुत मुश्किलों से भरा होता था. जब वो घर से निकलती थी तो लोग उनके ऊपर सड़े टमाटर, अंडे, कचरा, गोबर और पत्थर फेंकते थे. तब वो विद्यालय पहुँच कर अपने साथ लायी दूसरी साड़ी को पहनती थी. 1 जनवरी 1848 से 15 मार्च 1852 के दौरान सावित्रीबाई फुले और ज्योतिबा फुले ने बिना किसी आर्थिक मदद और सहारे के लड़कियों के लिए 18 विद्यालय खोले. उस दौर में ऐसा सामाजिक क्रांतिकारी पहल पहले किसी ने नही की थी. 1849 में उस्मान शेख के घर पर मुस्लिम स्त्रियों व बच्चों के लिए स्कूल खोला. सावित्रीबाई अपने विद्यार्थियों से कहा करती, कड़ी मेहनत करो, अच्छे से पढ़ाई करो और अच्छा काम करो. 

सावित्रीबाई फुले ने स्त्री की दशा सुधारने के लिए 1852 में महिला मंडल, ज्योतिबा के साथ मिलकर 1853 में ‘बाल-हत्या प्रतिबंधक-गृह’, 1855 में मजदूरों के लिए ‘रात्रि पाठशाला’ खोला गया. विधवाओं के सिर मुंडन प्रथा के खिलाफ भी ये दम्पति खड़ा हुआ. इन्होनें अपने घर के भीतर पानी के भंडार को दलित समुदाय के लिए खोल दिया. 24 सितम्बर 1873 को फुले दम्पति ने सत्यशोधक समाज की स्थापना कर विधवा विवाह की परंपरा शुरू की. पुणे में अकाल के दौरान इन्होनें बच्चों और गरीब जरूरतमंद लोगों के लिये मुफ्त भोजन की व्यवस्था की. 1897 में पुणे में प्लेग की भयंकर महामारी के दौरान सावित्रीबाई ने अपने दत्तक पुत्र यशवंत की मदद से एक हॉस्पिटल खोला. वे बीमार लोगों के पास जाती, सेवा और देख-भाल करती, हॉस्पिटल लातीं थीं. इस प्रक्रिया में वो भी महामारी की चपेट में आ गयी और 10 मार्च 1897 को सावित्रीबाई फुले की इस बीमारी के चलते निधन हो गया. सावित्रीबाई ने अनेक लेखों और कविताओं के माध्यम से सामाजिक चेतना जगायी. इनकी कुछ प्रमुख रचनायें हैं– 'काव्य फुले', 'बावनकशी सुबोध रत्नाकर', ‘मातोश्री के भाषण’, ‘बावनकाशी सुबोध रत्नाकरआदि.

सावित्रीबाई फुले के इन्ही प्रयासों के कारण महिलाओं को शिक्षा मिलने की शुरुवात हुई परन्तु इतने सालों बाद भी बच्चियां शिक्षा के मामले में पिछड़ी और वंचित हैं. इसके पीछे कई कारण हैं जो आज भी कम-ज्यादा रूप में अनवरत जारी हैं. हमारा समाज पितृसत्तात्मक सोच से ग्रसित है जिसके कारण बालिका शिक्षा को लेकर आज भी परिवार और समाज की सोच है कि बालिका पराया धन है, इसे आगे चल कर ससुराल जाना है, घर परिवार की देखभाल/ चूल्हा चौका ही करना है, इसलिए वो इतनी ही शिक्षा प्राप्त कर ले जिससे उसे हिसाब-किताब, थोडा पढ़ना-लिखना आ जाए. परिवार का जोर उसे घर के कामों को सिखाने में ज्यादा होता है. बच्चियों का आज भी बाल विवाह होना जारी है जिसके कारण उनकी शिक्षा प्रभावित होती हैं.

स्कूलों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा न होना, स्कूलों का लगातार बंद होना, अधोसंरचना-पर्याप्त शिक्षक/स्टाफ की कमी, शौचालय का न होना,ताला लगा होना,पानी न होना और अगर है तो उसकी साफ़-सफाई न होना भी बच्चियों के स्कूल न जाने के कारण हैं. यूनेस्को द्वारा स्टेट ऑफ द एजुकेशन रिपोर्ट 2021: नो टीचर नो क्लासनामक रिपोर्ट के अनुसार भारत में लगभग 1.10 लाख ऐसे स्कूल हैं जो केवल एक शिक्षक के भरोसे चल रहे हैं. वही शिक्षकों के 11.16 लाख पद खाली पड़े हैं इनमें से ज्यादातर 69 प्रतिशत ग्रामीण इलाकों के स्कूल हैं.

स्कूल न जाने/छोड़ने का एक अहम् कारण सुरक्षा भी हैं. नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो की रिपोर्ट देखें तो लड़कियों के प्रति हिंसा लगातार बढ़ रही है. ये बड़ी विडंबना है कि ज्यादातर बड़ी कक्षा के स्कूल या तो गावं के बाहर या दूसरे गावं में होते हैं. जिसके कारण बच्चियों को पढ़ने के लिए दूर जाना पड़ता है और रास्ते में लड़के खड़े हो कर लड़कियों के साथ छेड़छाड़,गंदी बातें/हरकतें करते हैं. इसी के कारण परिवार वाले बच्चियों को स्कूल में भेजना नहीं चाहते हैं और ये भी देखने में आता है कि अगर स्कूल जाते समय किसी बच्ची के साथ लैंगिक हिंसा होती है तो उसका असर आसपास के कई गावं के बच्चियों की शिक्षा पर पड़ता हैं.

माँ और पिता रोजगार के लिए पलायन या कमाने जाते हैं तो बड़ी बच्ची स्कूल न जा कर अपने छोटे भाई-बहनों की देखभाल करती हैं और थोड़ी बड़ी होने पर खुद भी काम पर लग जाती है. आर्थिक रूप से कमजोर परिवार निशुल्क शिक्षा के चलते बच्चियों को कक्षा 8 तक पढ़ाते हैं लेकिन कक्षा 9 से लगने वाली फ़ीस देने में असमर्थ रहते हैं जिसके कारण वो बच्चियों को आगे नहीं पढ़ाते हैं.

किशोरावस्था में बच्चियों के साथ कई बार स्कूलों में ऐसी स्थिति बन जाती है कि उन्हें किसी महिला की जरुरत होती है, कई सारी बातें ऐसी होती हैं जिसे बच्चियां अपने घर में भी नहीं बताना चाहती हैं ऐसे समय में महिला शिक्षक उन्हें सहयोग और उचित सलाह दे सकती है लेकिन गावों के स्कूलों में महिला शिक्षकों की संख्या कम या होती ही नहीं है. अगर बालिका को स्कूल में महावारी हो जाए तो सेनेटरी पैड उपलब्ध नहीं होता है. सामाजिक संस्था दसराद्वारा 2019 में जारी रिपोर्ट के अनुसार 2.3 करोड़ लड़कियों के हर साल स्कूल छोड़ने का कारण माहवारी के दौरान स्वच्छता के लिए जरूरी सुविधाओं जैसे सैनिटरी पैड्स और जानकारी का उपलब्ध नहीं होना हैं. हाल ही में यूनिसेफ ने एक अध्ययन में बताया है कि भारत में 71 फीसदी किशोरियों को माहवारी के बारे में जानकारी नहीं है. उन्हें पहली बार माहवारी होने पर इसका पता चलता है. और ऐसा होते ही उन्हें स्कूल भेजना बंद कर दिया जाता है.

देखने में आता है कि कई आदिवासी परिवारों में उनके लड़के/लड़कियां फस्ट लर्नर है और इन्हें  घर से किसी भी तरह का सहयोग नहीं मिल पाता है जिससे ये धीरे धीरे अन्य बच्चों से पिछड़ जाते हैं और पढ़ाई छोड़ देते हैं. पारधी जनजाति के प्रति पूर्वाग्रह होने के कारण इनके साथ स्कूलों में भेदभाव होता है, कही भी कोई क्राइम होता है तो पुलिस इन्ही पर शक करती है जिसके कारण पुरुष ज्यादा घर से बाहर नहीं निकलते हैं और महिलाओं और बच्चियों को काम करना पड़ता है. इसी तरह बेडिया जनजाति में बच्चियों को स्कूल के बदले उनके ट्रेडिशनल काम (वेश्यावृत्ति) में लगा दिया जाता है.

इधर कोरोना महामारी के काल में शिक्षा का सबसे ज्यादा नुकसान बच्चियों को हुआ है. ज्यादातर बच्चियां आनलाइन शिक्षा प्राप्त नहीं कर पायी हैं और अब वो अपनी कक्षा के अन्य बच्चों से पिछड गयी हैं. कोरोना के पहले जो कुछ आता भी था वे उसे इतने समय में भूल भी गयी होगी. अब इन बच्चियों के आगे की शिक्षा पर प्रश्नचिन्ह लग गया है. कोरोना महामारी के कारण लोगों के रोजगार चले जाने से आर्थिक स्थिति बहुत कमजोर हो गयी है जिसके चलते लड़के-लड़कियां मजदूरी करने को मजबूर हैं. जैसे निमाड़ में कपास चुनने के लिए कोमल हाथ की जरुरत होती है तो 10 से 18 साल की बच्चियों को इस काम में रखा जाता है. ये बच्चियां अपनी पढ़ाई छोड़ कर घर में आर्थिक सहयोग देने के लिए यहाँ काम करती हैं.

देश में बालिका शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए सरकार द्वारा चलाई जा रही योजनाओं का लाभ  सही समय पर नहीं मिल पाता है. अगर इन विभिन्न योजनाओं का लाभ समय पर मिले तो बालिकाओं के शिक्षा ग्रहण करने में बढ़ोतरी होगी. नयी राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में बालिकाओं और महिलाओं की शिक्षा में भागीदारी बढ़ाने के लिए जेन्डरसमावेशी कोष बनाने की बात की हैं . इस कोष से राज्यों को महिला सम्बन्धी नीतियों, योजनाओं, कार्यक्रमों आदि को लागू करने में सहायता मिलेगी जिससे बालिकाओं की शिक्षा को बढ़ावा, विद्यालय परिसर में अधिक सुरक्षापूर्ण और स्वस्थ वातावरण मिल सकेगा. सावित्री बाई फुले का ये सपना था कि देश की हर बच्ची/महिला शिक्षित हो. परिवार और समाज में ये विश्वास लाना होगा कि बालिका शिक्षा का महत्व क्या है और अगर बच्चियों को मौका दिया जाए तो वो जीवन में आगे बढ़ सकती हैं.

 



 उपासना बेहार 

Image Courtesy -Google.com

सावित्रीबाई फुले भारत की प्रथम महिला शिक्षिका, प्रथम शिक्षाविद्, समाज सुधारक और मराठी लेखक व कवियत्री थीं. उन्होंने उन्नीसवीं सदी में अपने पति ज्योतिराव गोविंदराव फुले के साथ मिलकर शिक्षा के क्षेत्र के साथ साथ स्त्री अधिकारों, छुआछुत, सतीप्रथा, विधवाविवाह, बालविवाह, अंधविश्वास, के खिलाफ संघर्ष किया. सावित्रीबाई का जन्म 3 जनवरी 1831 को महाराष्ट्र के सतारा जिले के नायगांव गॉव में हुआ था. 9 साल की आयु में उनकी शादी ज्योतिबा फुले के साथ हुई. जब विवाह हुआ था उस समय तक उनको स्कूली शिक्षा नहीं मिली थी. उनके पिता का मानना था कि शिक्षा का अधिकार केवल उच्च जाति के पुरुषों को ही था. जबकि उनके पति ज्योतिराव फुले की सोच थी कि दलित और महिलाओं की आत्मनिर्भरता, शोषण से मुक्ति और विकास के लिए सबसे जरुरी है शिक्षा. उन्होंने इसी सोच को जमीनी हकीकत में उतारने की शुरुआत सावित्रीबाई फुले को शिक्षित करने से की.

सावित्रीबाई ने ज्योतिबा के साथ मिल कर 1848 में पुणे में बालिका विद्यालय की स्थापना की, जिसमें दबी-पिछड़ी जातियों के बच्चे, विशेषकर लड़कियाँ की संख्या ज्यादा थी. सावित्रीबाई का रोज घर से विद्यालय जाने का सफ़र बहुत मुश्किलों से भरा होता था. जब वो घर से निकलती थी तो लोग उनके ऊपर सड़े टमाटर, अंडे, कचरा, गोबर और पत्थर फेंकते थे. तब वो विद्यालय पहुँच कर अपने साथ लायी दूसरी साड़ी को पहनती थी. 1 जनवरी 1848 से 15 मार्च 1852 के दौरान सावित्रीबाई फुले और ज्योतिबा फुले ने बिना किसी आर्थिक मदद और सहारे के लड़कियों के लिए 18 विद्यालय खोले. उस दौर में ऐसा सामाजिक क्रांतिकारी पहल पहले किसी ने नही की थी. 1849 में उस्मान शेख के घर पर मुस्लिम स्त्रियों व बच्चों के लिए स्कूल खोला. सावित्रीबाई अपने विद्यार्थियों से कहा करती, कड़ी मेहनत करो, अच्छे से पढ़ाई करो और अच्छा काम करो. 

सावित्रीबाई फुले ने स्त्री की दशा सुधारने के लिए 1852 में महिला मंडल, ज्योतिबा के साथ मिलकर 1853 में ‘बाल-हत्या प्रतिबंधक-गृह’, 1855 में मजदूरों के लिए ‘रात्रि पाठशाला’ खोला गया. विधवाओं के सिर मुंडन प्रथा के खिलाफ भी ये दम्पति खड़ा हुआ. इन्होनें अपने घर के भीतर पानी के भंडार को दलित समुदाय के लिए खोल दिया. 24 सितम्बर 1873 को फुले दम्पति ने सत्यशोधक समाज की स्थापना कर विधवा विवाह की परंपरा शुरू की. पुणे में अकाल के दौरान इन्होनें बच्चों और गरीब जरूरतमंद लोगों के लिये मुफ्त भोजन की व्यवस्था की. 1897 में पुणे में प्लेग की भयंकर महामारी के दौरान सावित्रीबाई ने अपने दत्तक पुत्र यशवंत की मदद से एक हॉस्पिटल खोला. वे बीमार लोगों के पास जाती, सेवा और देख-भाल करती, हॉस्पिटल लातीं थीं. इस प्रक्रिया में वो भी महामारी की चपेट में आ गयी और 10 मार्च 1897 को सावित्रीबाई फुले की इस बीमारी के चलते निधन हो गया. सावित्रीबाई ने अनेक लेखों और कविताओं के माध्यम से सामाजिक चेतना जगायी. इनकी कुछ प्रमुख रचनायें हैं– 'काव्य फुले', 'बावनकशी सुबोध रत्नाकर', ‘मातोश्री के भाषण’, ‘बावनकाशी सुबोध रत्नाकरआदि.

सावित्रीबाई फुले के इन्ही प्रयासों के कारण महिलाओं को शिक्षा मिलने की शुरुवात हुई परन्तु इतने सालों बाद भी बच्चियां शिक्षा के मामले में पिछड़ी और वंचित हैं. इसके पीछे कई कारण हैं जो आज भी कम-ज्यादा रूप में अनवरत जारी हैं. हमारा समाज पितृसत्तात्मक सोच से ग्रसित है जिसके कारण बालिका शिक्षा को लेकर आज भी परिवार और समाज की सोच है कि बालिका पराया धन है, इसे आगे चल कर ससुराल जाना है, घर परिवार की देखभाल/ चूल्हा चौका ही करना है, इसलिए वो इतनी ही शिक्षा प्राप्त कर ले जिससे उसे हिसाब-किताब, थोडा पढ़ना-लिखना आ जाए. परिवार का जोर उसे घर के कामों को सिखाने में ज्यादा होता है. बच्चियों का आज भी बाल विवाह होना जारी है जिसके कारण उनकी शिक्षा प्रभावित होती हैं.

स्कूलों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा न होना, स्कूलों का लगातार बंद होना, अधोसंरचना-पर्याप्त शिक्षक/स्टाफ की कमी, शौचालय का न होना,ताला लगा होना,पानी न होना और अगर है तो उसकी साफ़-सफाई न होना भी बच्चियों के स्कूल न जाने के कारण हैं. यूनेस्को द्वारा स्टेट ऑफ द एजुकेशन रिपोर्ट 2021: नो टीचर नो क्लासनामक रिपोर्ट के अनुसार भारत में लगभग 1.10 लाख ऐसे स्कूल हैं जो केवल एक शिक्षक के भरोसे चल रहे हैं. वही शिक्षकों के 11.16 लाख पद खाली पड़े हैं इनमें से ज्यादातर 69 प्रतिशत ग्रामीण इलाकों के स्कूल हैं.

स्कूल न जाने/छोड़ने का एक अहम् कारण सुरक्षा भी हैं. नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो की रिपोर्ट देखें तो लड़कियों के प्रति हिंसा लगातार बढ़ रही है. ये बड़ी विडंबना है कि ज्यादातर बड़ी कक्षा के स्कूल या तो गावं के बाहर या दूसरे गावं में होते हैं. जिसके कारण बच्चियों को पढ़ने के लिए दूर जाना पड़ता है और रास्ते में लड़के खड़े हो कर लड़कियों के साथ छेड़छाड़,गंदी बातें/हरकतें करते हैं. इसी के कारण परिवार वाले बच्चियों को स्कूल में भेजना नहीं चाहते हैं और ये भी देखने में आता है कि अगर स्कूल जाते समय किसी बच्ची के साथ लैंगिक हिंसा होती है तो उसका असर आसपास के कई गावं के बच्चियों की शिक्षा पर पड़ता हैं.

माँ और पिता रोजगार के लिए पलायन या कमाने जाते हैं तो बड़ी बच्ची स्कूल न जा कर अपने छोटे भाई-बहनों की देखभाल करती हैं और थोड़ी बड़ी होने पर खुद भी काम पर लग जाती है. आर्थिक रूप से कमजोर परिवार निशुल्क शिक्षा के चलते बच्चियों को कक्षा 8 तक पढ़ाते हैं लेकिन कक्षा 9 से लगने वाली फ़ीस देने में असमर्थ रहते हैं जिसके कारण वो बच्चियों को आगे नहीं पढ़ाते हैं.

किशोरावस्था में बच्चियों के साथ कई बार स्कूलों में ऐसी स्थिति बन जाती है कि उन्हें किसी महिला की जरुरत होती है, कई सारी बातें ऐसी होती हैं जिसे बच्चियां अपने घर में भी नहीं बताना चाहती हैं ऐसे समय में महिला शिक्षक उन्हें सहयोग और उचित सलाह दे सकती है लेकिन गावों के स्कूलों में महिला शिक्षकों की संख्या कम या होती ही नहीं है. अगर बालिका को स्कूल में महावारी हो जाए तो सेनेटरी पैड उपलब्ध नहीं होता है. सामाजिक संस्था दसराद्वारा 2019 में जारी रिपोर्ट के अनुसार 2.3 करोड़ लड़कियों के हर साल स्कूल छोड़ने का कारण माहवारी के दौरान स्वच्छता के लिए जरूरी सुविधाओं जैसे सैनिटरी पैड्स और जानकारी का उपलब्ध नहीं होना हैं. हाल ही में यूनिसेफ ने एक अध्ययन में बताया है कि भारत में 71 फीसदी किशोरियों को माहवारी के बारे में जानकारी नहीं है. उन्हें पहली बार माहवारी होने पर इसका पता चलता है. और ऐसा होते ही उन्हें स्कूल भेजना बंद कर दिया जाता है.

देखने में आता है कि कई आदिवासी परिवारों में उनके लड़के/लड़कियां फस्ट लर्नर है और इन्हें  घर से किसी भी तरह का सहयोग नहीं मिल पाता है जिससे ये धीरे धीरे अन्य बच्चों से पिछड़ जाते हैं और पढ़ाई छोड़ देते हैं. पारधी जनजाति के प्रति पूर्वाग्रह होने के कारण इनके साथ स्कूलों में भेदभाव होता है, कही भी कोई क्राइम होता है तो पुलिस इन्ही पर शक करती है जिसके कारण पुरुष ज्यादा घर से बाहर नहीं निकलते हैं और महिलाओं और बच्चियों को काम करना पड़ता है. इसी तरह बेडिया जनजाति में बच्चियों को स्कूल के बदले उनके ट्रेडिशनल काम (वेश्यावृत्ति) में लगा दिया जाता है.

इधर कोरोना महामारी के काल में शिक्षा का सबसे ज्यादा नुकसान बच्चियों को हुआ है. ज्यादातर बच्चियां आनलाइन शिक्षा प्राप्त नहीं कर पायी हैं और अब वो अपनी कक्षा के अन्य बच्चों से पिछड गयी हैं. कोरोना के पहले जो कुछ आता भी था वे उसे इतने समय में भूल भी गयी होगी. अब इन बच्चियों के आगे की शिक्षा पर प्रश्नचिन्ह लग गया है. कोरोना महामारी के कारण लोगों के रोजगार चले जाने से आर्थिक स्थिति बहुत कमजोर हो गयी है जिसके चलते लड़के-लड़कियां मजदूरी करने को मजबूर हैं. जैसे निमाड़ में कपास चुनने के लिए कोमल हाथ की जरुरत होती है तो 10 से 18 साल की बच्चियों को इस काम में रखा जाता है. ये बच्चियां अपनी पढ़ाई छोड़ कर घर में आर्थिक सहयोग देने के लिए यहाँ काम करती हैं.

देश में बालिका शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए सरकार द्वारा चलाई जा रही योजनाओं का लाभ  सही समय पर नहीं मिल पाता है. अगर इन विभिन्न योजनाओं का लाभ समय पर मिले तो बालिकाओं के शिक्षा ग्रहण करने में बढ़ोतरी होगी. नयी राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में बालिकाओं और महिलाओं की शिक्षा में भागीदारी बढ़ाने के लिए जेन्डरसमावेशी कोष बनाने की बात की हैं . इस कोष से राज्यों को महिला सम्बन्धी नीतियों, योजनाओं, कार्यक्रमों आदि को लागू करने में सहायता मिलेगी जिससे बालिकाओं की शिक्षा को बढ़ावा, विद्यालय परिसर में अधिक सुरक्षापूर्ण और स्वस्थ वातावरण मिल सकेगा. सावित्री बाई फुले का ये सपना था कि देश की हर बच्ची/महिला शिक्षित हो. परिवार और समाज में ये विश्वास लाना होगा कि बालिका शिक्षा का महत्व क्या है और अगर बच्चियों को मौका दिया जाए तो वो जीवन में आगे बढ़ सकती हैं.

 



Wednesday, January 4, 2023

बाल कहानी -अमर अकबर और ब्रूनों

 

उपासना बेहार

Image Courtesy -Google.com


अमर और अकबर दोनों 9 क्लास में पढ़ते थे. दोनों रोज शाम में क्रिकेट खेलने जाते थे. एक दिन जब अकबर मैदान के बाउंड्रीवाल के पास फ्ल्डिंग कर रहा था तो उसे बाउंड्रीवाल के उस पार से कुछ लोगों की आवाज सुनाई दी जिसमें लड़की का किडनैप शब्द सुन कर वो चौक गया. उसे लगा मामला कुछ गड़बड़ है. वह बाउंड्रीवाल से सट कर ध्यान से उनकी बात सुनने लगा. उनकी बातों से अकबर को समझ आया कि इन बदमाशों ने शहर के राजेश वर्मा नाम के किसी व्यक्ति की बेटी का अपहरण किया है और उनसे फिरौती मांगने वाले हैं, उसी की प्लानिग कर रहे हैं कि कैसे और कहां फिरौती की रकम लेकर आने को कहें. अकबर उनकी प्लानिग सुन पाता इससे पहले ही बैट्समेन ने इतनी जोरदार शाट मारा कि बॉल हवा में उड़ती हुई तेजी से उन अपहरणकर्ताओं के ऊपर जा गिरी. अकबर तुरंत बाउंड्रीवाल पर चढ़ कर दूसरी तरफ झाँक कर बोला सॉरी अंकल, हम मैदान में क्रिकेट खेल रहे है तो गलती से बॉल आप लोगों को लग गयी. अकबर उन लोगों से बात जरुर कर रहा था लेकिन बहुत ध्यान से उन अपहरणकर्ताओं के चेहरों को देख लेना चाहता था. अपहरणकर्ताओं ने गुस्से से अकबर को देखा और बॉल उसकी तरफ उछाल कर सभी ने आखों ही आखों में इशारा किया और वहाँ से चले गए.

अकबर तुरंत अमर के पास गया और अपहरणकर्ताओं से सुनी बात बताई. अमर ने कहा हमें जल्दी ही पुलिस थाने चलना चाहिए. वहाँ पहुँच कर इंस्पेक्टर अंकल को पूरी बात बताई. इंस्पेक्टर अंकल ने कहा तुम दोनों ने ये सब बता कर बहुत अच्छा किया. अकबर बेटा ये बताओ कि तुमने तो उन अपहरणकर्ताओं को देखा है, तो क्या तुम्हें उनमें से किसी का चेहरा याद है ताकि हम उनका स्कैच बना कर उन्हें पकड़ने की कोशिश करेगें. तबतक मैं पता करता हूँ कि राजीव वर्मा कौन है और क्या सच में उनकी बेटी का अपहरण हुआ है. अंकल वो 5 लोग थे लेकिन मुझे सब का चेहरा तो याद नहीं है पर दो लोगों का चेहरा मैं कभी भूल नहीं सकता हूँ. अकबर ने चित्रकार को बताया कि एक व्यक्ति के माथे पर एक लम्बा निशान है जबकि दूसरे आदमी के बाए हाथ में मगरमच्छ का टेटू था और उसके सारे बाल एकदम सफ़ेद थे.

इंस्पेक्टर अंकल ने हैडआफिस से पता किया तो उन्हें जानकारी मिली कि शहर के बिजनेसमैन राजीव वर्मा की बेटी का अपहरण हुआ है और अपहरणकर्ताओं ने फिरौती में एक करोड़ रूपए मांगें हैं जो उन्हें 5 दिन के अन्दर देने हैं. इंस्पेक्टर अंकल ने दोनों अपहरणकर्ताओं के स्कैच को शहर के सभी थानों में भेज दिया. इंस्पेक्टर अंकल ने अकबर से कहा बेटा तुम मुझे उस जगह ले चलो जहाँ तुमने अपहरणकर्ताओं को बात करते हुये सुना था.

अकबर ने इंस्पेक्टर अंकल वो जगह दिखायी. इंस्पेक्टर अंकल ने दोनों बच्चों से कहा तुम दोनों घर चले जाओ, आगे की खोजबीन हम करेगें. पुलिस अपने साथ उनका ट्रेंड किया हुआ खोजी कुत्ता लेकर आई थी. खोजी कुत्ते ब्रूनो ने जगह को सूंघा और पास की बस्ती की और चल पड़ा. फिर एक बंद मकान के पास जा कर ब्रूनो रुक गया. पुलिस ने घर की खुली खिड़की से अंदर झाँक कर देखा तो लगा कि वहाँ कोई रहता है. इंस्पेक्टर अंकल ने सादी वर्दी में कुछ पुलिस वालों को उस घर के आसपास निगरानी रखने को कहा. उसी दिन रात को एक व्यक्ति उस घर में आया. आसपास तैनात पुलिस ने उसे पकड़ लिया. इस व्यक्ति का चेहरा दोनों स्कैच में से एक अपहरणकर्ता के चेहरे से बिलकुल मिल रहा था. इसके भी माथे पर एक लम्बा निशान था. उस व्यक्ति को लेकर पुलिस थाने आ गयी. जब इंस्पेक्टर अंकल ने उससे पूछताछ की तो उस व्यक्ति ने कबूल किया कि उसने और उसके साथियों ने मिल कर बिजनेसमैन राजीव वर्मा की बच्ची का अपहरण किया है और उनसे 1 करोड़ की फिरौती मांगी है. फिर उस अपहरणकर्ता ने उस जगह का पता भी बता दिया जहाँ बच्ची को रखा गया था. बाद में पुलिस ने बाकी अपहरणकर्ताओं को भी पकड़ लिया और बच्ची को छुड़ा कर उनके माँ-पापा को सौप दिया.

इंस्पेक्टर अंकल ने अमर और अकबर को थाने बुला कर बहादुर बच्चों का ख़िताब दिया, वही बिजनेसमैन राजीव वर्मा ने बच्चों को बहुत सारी किताबें और एक-एक साइकिल गिफ्ट की.


 




 

उपासना बेहार

Image Courtesy -Google.com


अमर और अकबर दोनों 9 क्लास में पढ़ते थे. दोनों रोज शाम में क्रिकेट खेलने जाते थे. एक दिन जब अकबर मैदान के बाउंड्रीवाल के पास फ्ल्डिंग कर रहा था तो उसे बाउंड्रीवाल के उस पार से कुछ लोगों की आवाज सुनाई दी जिसमें लड़की का किडनैप शब्द सुन कर वो चौक गया. उसे लगा मामला कुछ गड़बड़ है. वह बाउंड्रीवाल से सट कर ध्यान से उनकी बात सुनने लगा. उनकी बातों से अकबर को समझ आया कि इन बदमाशों ने शहर के राजेश वर्मा नाम के किसी व्यक्ति की बेटी का अपहरण किया है और उनसे फिरौती मांगने वाले हैं, उसी की प्लानिग कर रहे हैं कि कैसे और कहां फिरौती की रकम लेकर आने को कहें. अकबर उनकी प्लानिग सुन पाता इससे पहले ही बैट्समेन ने इतनी जोरदार शाट मारा कि बॉल हवा में उड़ती हुई तेजी से उन अपहरणकर्ताओं के ऊपर जा गिरी. अकबर तुरंत बाउंड्रीवाल पर चढ़ कर दूसरी तरफ झाँक कर बोला सॉरी अंकल, हम मैदान में क्रिकेट खेल रहे है तो गलती से बॉल आप लोगों को लग गयी. अकबर उन लोगों से बात जरुर कर रहा था लेकिन बहुत ध्यान से उन अपहरणकर्ताओं के चेहरों को देख लेना चाहता था. अपहरणकर्ताओं ने गुस्से से अकबर को देखा और बॉल उसकी तरफ उछाल कर सभी ने आखों ही आखों में इशारा किया और वहाँ से चले गए.

अकबर तुरंत अमर के पास गया और अपहरणकर्ताओं से सुनी बात बताई. अमर ने कहा हमें जल्दी ही पुलिस थाने चलना चाहिए. वहाँ पहुँच कर इंस्पेक्टर अंकल को पूरी बात बताई. इंस्पेक्टर अंकल ने कहा तुम दोनों ने ये सब बता कर बहुत अच्छा किया. अकबर बेटा ये बताओ कि तुमने तो उन अपहरणकर्ताओं को देखा है, तो क्या तुम्हें उनमें से किसी का चेहरा याद है ताकि हम उनका स्कैच बना कर उन्हें पकड़ने की कोशिश करेगें. तबतक मैं पता करता हूँ कि राजीव वर्मा कौन है और क्या सच में उनकी बेटी का अपहरण हुआ है. अंकल वो 5 लोग थे लेकिन मुझे सब का चेहरा तो याद नहीं है पर दो लोगों का चेहरा मैं कभी भूल नहीं सकता हूँ. अकबर ने चित्रकार को बताया कि एक व्यक्ति के माथे पर एक लम्बा निशान है जबकि दूसरे आदमी के बाए हाथ में मगरमच्छ का टेटू था और उसके सारे बाल एकदम सफ़ेद थे.

इंस्पेक्टर अंकल ने हैडआफिस से पता किया तो उन्हें जानकारी मिली कि शहर के बिजनेसमैन राजीव वर्मा की बेटी का अपहरण हुआ है और अपहरणकर्ताओं ने फिरौती में एक करोड़ रूपए मांगें हैं जो उन्हें 5 दिन के अन्दर देने हैं. इंस्पेक्टर अंकल ने दोनों अपहरणकर्ताओं के स्कैच को शहर के सभी थानों में भेज दिया. इंस्पेक्टर अंकल ने अकबर से कहा बेटा तुम मुझे उस जगह ले चलो जहाँ तुमने अपहरणकर्ताओं को बात करते हुये सुना था.

अकबर ने इंस्पेक्टर अंकल वो जगह दिखायी. इंस्पेक्टर अंकल ने दोनों बच्चों से कहा तुम दोनों घर चले जाओ, आगे की खोजबीन हम करेगें. पुलिस अपने साथ उनका ट्रेंड किया हुआ खोजी कुत्ता लेकर आई थी. खोजी कुत्ते ब्रूनो ने जगह को सूंघा और पास की बस्ती की और चल पड़ा. फिर एक बंद मकान के पास जा कर ब्रूनो रुक गया. पुलिस ने घर की खुली खिड़की से अंदर झाँक कर देखा तो लगा कि वहाँ कोई रहता है. इंस्पेक्टर अंकल ने सादी वर्दी में कुछ पुलिस वालों को उस घर के आसपास निगरानी रखने को कहा. उसी दिन रात को एक व्यक्ति उस घर में आया. आसपास तैनात पुलिस ने उसे पकड़ लिया. इस व्यक्ति का चेहरा दोनों स्कैच में से एक अपहरणकर्ता के चेहरे से बिलकुल मिल रहा था. इसके भी माथे पर एक लम्बा निशान था. उस व्यक्ति को लेकर पुलिस थाने आ गयी. जब इंस्पेक्टर अंकल ने उससे पूछताछ की तो उस व्यक्ति ने कबूल किया कि उसने और उसके साथियों ने मिल कर बिजनेसमैन राजीव वर्मा की बच्ची का अपहरण किया है और उनसे 1 करोड़ की फिरौती मांगी है. फिर उस अपहरणकर्ता ने उस जगह का पता भी बता दिया जहाँ बच्ची को रखा गया था. बाद में पुलिस ने बाकी अपहरणकर्ताओं को भी पकड़ लिया और बच्ची को छुड़ा कर उनके माँ-पापा को सौप दिया.

इंस्पेक्टर अंकल ने अमर और अकबर को थाने बुला कर बहादुर बच्चों का ख़िताब दिया, वही बिजनेसमैन राजीव वर्मा ने बच्चों को बहुत सारी किताबें और एक-एक साइकिल गिफ्ट की.


 




Saturday, January 22, 2022

बाल कहानी - लड्डुओं की बारिश


उपासना बेहार 

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उत्तराखंड के रामगढ़ गाँव में बानी रहती थी उसका घर पहाड़ की चोटी पर था. उसकी माँ स्वादिष्ट मिठाइयाँ बनाती थी. एक दिन उसकी माँ ने लड्डू बनाये और फिर उन्हें एक गोल डब्बे में अच्छी तरह से बंद करके रखा तभी लड्डुओं से भरा ये डिब्बा उनके हाथ से फिसल कर गिर गया और लुढ़कने लगा. लुढ़कते हुये वो घर के खुले दरवाजे से बाहर की ओर चला गया. माँ लड्डुओं से भरे डिब्बे के पीछे दौड़ी. डिब्बा तो तेजी से पहाड़ी से नीचे की तरफ लुढ़कने लगा. माँ चिल्लाने लगी “अरे मेरा लड्डुओं से भरा डिब्बा लुढ़का रे, कोई उसे पकड़ो रे.”

तभी बानी के पापा आये, उन्होंने भी डिब्बा लुढ़कते देखा. माँ फिर से चिल्लाने लगी “अरे मेरा लड्डुओं से भरा डिब्बा लुढ़का रे,कोई उसे पकड़ो रे.” पापा भी डिब्बे को पकड़ने के लिए भागने लगे. तभी माँ को बेटा आता दिखाई दिया, माँ जोर से बोली “ अरे लड्डुओं से भरा डिब्बा लुढ़का रे, बेटा उसे पकड़ो रे.” ढलान होने के कारण डिब्बा पहाड़ से नीचे की तरफ तेजी से लुढ़कने लगा. भाई भी डिब्बे के पीछे भागा. अब आगे डिब्बा लुढ़क रहा था उसके पीछे माँ भाग रही थी, माँ के पीछे पापा भाग रहे थे, पापा के पीछे भाई भाग रहा था. माँ चिल्लाये जा रही थी “अरे मेरा लड्डुओं से भरा डिब्बा लुढ़का रे,कोई उसे पकड़ो रे.” डिब्बा था कि रुकने का नाम नहीं ले रहा था और इतनी तेजी से लुढ़क रहा था कि सरपट भागता हुआ घोड़ा भी पीछे रह जाए.

इतने में गावं के मुखिया दिख गए, उन्हें देखते ही माँ जोर से बोली “मुखिया जी,मुखिया जी मेरा लड्डुओं से भरा डिब्बा लुढ़का रे, कोई उसे पकड़ो रे.” मुखिया ने देखा बड़ा सा डिब्बा लुढ़क रहा है. डिब्बा के अंदर के स्वादिष्ट लड्डुओं की कल्पना करके ही उनके मुहँ में पानी आ गया और वो भी डिब्बा को रोकने के लिए दौड़ पड़े. अब आगे आगे डिब्बा उसके पीछे माँ, माँ के पीछे पापा,पापा के पीछे भाई, भाई के पीछे मुखिया जी भाग रहे थे.

माँ ने देखा सामने से बानी आ रही है. माँ ने उसे जोर से आवाज लगाई “बानी लडडुओं से भरा डब्बा लुढ़का रे,तू उसे पकड़ रे.” बानी ने देखा डिब्बा तेजी से उसकी तरफ लुढ़कता हुआ आ रहा है, वो डिब्बे को पकड़ने के लिए रोड़ के बीच में खड़ी हो गयी. तभी रास्ते में एक बड़ा पत्थर आ गया. तेजी से लुढ़कता हुआ डब्बा जोर से उस पत्थर से टकराया और हवा में उछल गया. हवा में डिब्बा खुल गया. सारे लड्डू नीचे की और गिरने लगे. पहाड़ी के नीचे की तरफ कुछ लोग खड़े थे कि अचानक उनके ऊपर लड्डुओं की बारिश होने लगी. लोगों ने झटपट सारे लड्डुओं को कैच किया, वे सभी अचंभित हो गए कि आखिर ये लड्डुओं की बारिश कैसे हो रही है तभी उन्होंने देखा कि कई सारे लोग दौड़ते हुये उन्ही की तरफ आ रहे हैं. माँ ने देखा सभी के हाथों में लड्डू है. माँ ने सभी को लड्डुओं की बारिश का कारण बताया फिर सभी ने मिल कर कैच किये हुये लड्डू मजे से खाए.

ई मेल – upasanabehar@gmail.com



उपासना बेहार 

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उत्तराखंड के रामगढ़ गाँव में बानी रहती थी उसका घर पहाड़ की चोटी पर था. उसकी माँ स्वादिष्ट मिठाइयाँ बनाती थी. एक दिन उसकी माँ ने लड्डू बनाये और फिर उन्हें एक गोल डब्बे में अच्छी तरह से बंद करके रखा तभी लड्डुओं से भरा ये डिब्बा उनके हाथ से फिसल कर गिर गया और लुढ़कने लगा. लुढ़कते हुये वो घर के खुले दरवाजे से बाहर की ओर चला गया. माँ लड्डुओं से भरे डिब्बे के पीछे दौड़ी. डिब्बा तो तेजी से पहाड़ी से नीचे की तरफ लुढ़कने लगा. माँ चिल्लाने लगी “अरे मेरा लड्डुओं से भरा डिब्बा लुढ़का रे, कोई उसे पकड़ो रे.”

तभी बानी के पापा आये, उन्होंने भी डिब्बा लुढ़कते देखा. माँ फिर से चिल्लाने लगी “अरे मेरा लड्डुओं से भरा डिब्बा लुढ़का रे,कोई उसे पकड़ो रे.” पापा भी डिब्बे को पकड़ने के लिए भागने लगे. तभी माँ को बेटा आता दिखाई दिया, माँ जोर से बोली “ अरे लड्डुओं से भरा डिब्बा लुढ़का रे, बेटा उसे पकड़ो रे.” ढलान होने के कारण डिब्बा पहाड़ से नीचे की तरफ तेजी से लुढ़कने लगा. भाई भी डिब्बे के पीछे भागा. अब आगे डिब्बा लुढ़क रहा था उसके पीछे माँ भाग रही थी, माँ के पीछे पापा भाग रहे थे, पापा के पीछे भाई भाग रहा था. माँ चिल्लाये जा रही थी “अरे मेरा लड्डुओं से भरा डिब्बा लुढ़का रे,कोई उसे पकड़ो रे.” डिब्बा था कि रुकने का नाम नहीं ले रहा था और इतनी तेजी से लुढ़क रहा था कि सरपट भागता हुआ घोड़ा भी पीछे रह जाए.

इतने में गावं के मुखिया दिख गए, उन्हें देखते ही माँ जोर से बोली “मुखिया जी,मुखिया जी मेरा लड्डुओं से भरा डिब्बा लुढ़का रे, कोई उसे पकड़ो रे.” मुखिया ने देखा बड़ा सा डिब्बा लुढ़क रहा है. डिब्बा के अंदर के स्वादिष्ट लड्डुओं की कल्पना करके ही उनके मुहँ में पानी आ गया और वो भी डिब्बा को रोकने के लिए दौड़ पड़े. अब आगे आगे डिब्बा उसके पीछे माँ, माँ के पीछे पापा,पापा के पीछे भाई, भाई के पीछे मुखिया जी भाग रहे थे.

माँ ने देखा सामने से बानी आ रही है. माँ ने उसे जोर से आवाज लगाई “बानी लडडुओं से भरा डब्बा लुढ़का रे,तू उसे पकड़ रे.” बानी ने देखा डिब्बा तेजी से उसकी तरफ लुढ़कता हुआ आ रहा है, वो डिब्बे को पकड़ने के लिए रोड़ के बीच में खड़ी हो गयी. तभी रास्ते में एक बड़ा पत्थर आ गया. तेजी से लुढ़कता हुआ डब्बा जोर से उस पत्थर से टकराया और हवा में उछल गया. हवा में डिब्बा खुल गया. सारे लड्डू नीचे की और गिरने लगे. पहाड़ी के नीचे की तरफ कुछ लोग खड़े थे कि अचानक उनके ऊपर लड्डुओं की बारिश होने लगी. लोगों ने झटपट सारे लड्डुओं को कैच किया, वे सभी अचंभित हो गए कि आखिर ये लड्डुओं की बारिश कैसे हो रही है तभी उन्होंने देखा कि कई सारे लोग दौड़ते हुये उन्ही की तरफ आ रहे हैं. माँ ने देखा सभी के हाथों में लड्डू है. माँ ने सभी को लड्डुओं की बारिश का कारण बताया फिर सभी ने मिल कर कैच किये हुये लड्डू मजे से खाए.

ई मेल – upasanabehar@gmail.com


Thursday, July 9, 2020

बाल कहानी - मछली चाची और तपन


उपासना बेहार
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तपन एक लड़का था जो पढ़ने में आलसी था। उसके घर वाले उसे पढ़ने के लिए कहते लेकिन वह किसी की नही सुनता. उसकी छः माही परीक्षा का समय भी पास आ रहा था। एक दिन उसके पापा ने उसे समझाते हुए कहा तुम दिनभर खेलते रहते हो, जबकि अगले महीने तुम्हारी परीक्षा है, तुम्हें अपनी पढ़ाई पर ध्यान देना चाहिए।तपन चुपचाप सुनता रहा और गुस्से में घर से निकल कर पास बह रही नदी के किनारे जा कर बैठ गया और अपने आप से बड़बड़ाने लगा सभी मुझे डांटते हैं, कोई मुझसे प्यार नही करता है, कोई खेलने नही देता है। सब पढ़ो-पढ़ो की रट लगाते रहते हैं। परीक्षा को तो एक महीने हैं, अभी से चिंता करने की क्या जरुरत।

तभी नदी में से एक बड़ी मछली निकलती है। उसे देख तपन डर कर भागने लगता है तब मछली कहती है बेटा डरो मत तुम्हें उदास देख कर ही मैं बात करने बाहर आयी हूँ, तुम्हारी उदासी का कारण क्या है?’ तपन ने हिम्मत करके कहा मछली चाची मुझे खेलना अच्छा लगता है लेकिन घर वाले मुझे खेलने नही देते, बार बार पढ़ने को कहते है जबकि मेरी परीक्षा 1 महीने बाद है, मैं तो 15 दिन में ही पढ़ कर पास हो जाऊॅगा। इतने पहले पढ़ने से क्या फायदा।

ये सुन कर मछली चाची कहती हैं आओ मैं तुम्हें कुछ दिखाती हूँ।’  नदी के पास एक पेड़ की ओर इशारा करते हुए वो कहती हैं क्या तुम्हें उस पेड़ की टहनी पर एक चिडि़या कुछ करती दिखायी दे रही है?’  तपन ने कहा हाँ वो अपना घोसला बना रही है।मछली ने कहा तुमने सही कहा, असल में ये पक्षी ठंड में अंड़े देती है, इसलिए ये तिनके इक्टठे कर अपना घर बना रही है।तपन ने कहा पर ठंड आने में तो अभी 2 माह हैं और पक्षी को बड़ा घर तो बनाना नही है कि उसके लिए इतना समय लगे।चाची ने कहा तुम्हारी बात ठीक है इसे घर बनाने में ज्यादा समय नही लगता है चाहे तो वह ठंड शुरु होने के 10 दिन पहले भी ये काम कर सकती है पर तुम ही बताओ हड़बड़ी में क्या वो इतना मजबूत घर बना सकती है।’  तपन ने कहा नहीमछली चाची ने कहा इसी प्रकार तुम भी पढ़ाई तो 15 दिन में कर लोगे लेकिन क्या वो तुम्हें अच्छे से समझ आयेगा और आगे के लिए याद रहेगा।तपन चुपचाप उनकी बात सुनता है और अपने घर की ओर चल देता है। 

मछली चाची की बतायी बात से भी उसे कोई फर्क नही पड़ता। घर वाले भी उसे पढ़ने के लिए बोलना बंद कर देते हैं। परीक्षा में कुछ ही दिन बचे होते हैं। तपन अब परीक्षा की तैयारी शुरु करता है। पर उसे पाठ समझने में परेशानी आती है। परीक्षा का दिन भी आ जाता है पर तब भी उसका कोर्स कम्पलीट नही होता है। उसे घबराहट होने लगती है,पर अब वो कुछ नही कर सकता। किसी तरह परीक्षा देता है। जब रिजल्ट आता है तो वह फेल हो जाता है। 

वो रोते रोते उसी नदी के पास जाता है और मछली चाची को आवाज लगाता है, मछली चाची उसकी आवाज सुन कर बाहर आती है। उन्हें देखते ही तपन रो रो कर कहता है चाची मैंने फेल हो गया। मुझे आपकी बात समझ में आ गयी. मैंने न अपने घरवालों और न ही आपकी बात पर ध्यान दिया मुझे समझ आ गया कि जितना खेलना जरुरी है उतना पढ़ना भी जरुरी है. दोनों में तालमेल बना कर रकहना चाहिएमछली चाची उसे प्यार करते हुए कहती हैं चलो अब सब भूल कर वार्षिक परीक्षा की तैयारी करो और हाँ केवल पढ़ाई ही मत करना उसके साथ साथ खेलने के लिए भी समय रखना। तभी ओर अच्छे से पढ़ पाओगें।तपन ने मन ही मन ठान लिया कि वह अब रोज खेलेगा भी और पढ़ाई भी करेगा. 



उपासना बेहार
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तपन एक लड़का था जो पढ़ने में आलसी था। उसके घर वाले उसे पढ़ने के लिए कहते लेकिन वह किसी की नही सुनता. उसकी छः माही परीक्षा का समय भी पास आ रहा था। एक दिन उसके पापा ने उसे समझाते हुए कहा तुम दिनभर खेलते रहते हो, जबकि अगले महीने तुम्हारी परीक्षा है, तुम्हें अपनी पढ़ाई पर ध्यान देना चाहिए।तपन चुपचाप सुनता रहा और गुस्से में घर से निकल कर पास बह रही नदी के किनारे जा कर बैठ गया और अपने आप से बड़बड़ाने लगा सभी मुझे डांटते हैं, कोई मुझसे प्यार नही करता है, कोई खेलने नही देता है। सब पढ़ो-पढ़ो की रट लगाते रहते हैं। परीक्षा को तो एक महीने हैं, अभी से चिंता करने की क्या जरुरत।

तभी नदी में से एक बड़ी मछली निकलती है। उसे देख तपन डर कर भागने लगता है तब मछली कहती है बेटा डरो मत तुम्हें उदास देख कर ही मैं बात करने बाहर आयी हूँ, तुम्हारी उदासी का कारण क्या है?’ तपन ने हिम्मत करके कहा मछली चाची मुझे खेलना अच्छा लगता है लेकिन घर वाले मुझे खेलने नही देते, बार बार पढ़ने को कहते है जबकि मेरी परीक्षा 1 महीने बाद है, मैं तो 15 दिन में ही पढ़ कर पास हो जाऊॅगा। इतने पहले पढ़ने से क्या फायदा।

ये सुन कर मछली चाची कहती हैं आओ मैं तुम्हें कुछ दिखाती हूँ।’  नदी के पास एक पेड़ की ओर इशारा करते हुए वो कहती हैं क्या तुम्हें उस पेड़ की टहनी पर एक चिडि़या कुछ करती दिखायी दे रही है?’  तपन ने कहा हाँ वो अपना घोसला बना रही है।मछली ने कहा तुमने सही कहा, असल में ये पक्षी ठंड में अंड़े देती है, इसलिए ये तिनके इक्टठे कर अपना घर बना रही है।तपन ने कहा पर ठंड आने में तो अभी 2 माह हैं और पक्षी को बड़ा घर तो बनाना नही है कि उसके लिए इतना समय लगे।चाची ने कहा तुम्हारी बात ठीक है इसे घर बनाने में ज्यादा समय नही लगता है चाहे तो वह ठंड शुरु होने के 10 दिन पहले भी ये काम कर सकती है पर तुम ही बताओ हड़बड़ी में क्या वो इतना मजबूत घर बना सकती है।’  तपन ने कहा नहीमछली चाची ने कहा इसी प्रकार तुम भी पढ़ाई तो 15 दिन में कर लोगे लेकिन क्या वो तुम्हें अच्छे से समझ आयेगा और आगे के लिए याद रहेगा।तपन चुपचाप उनकी बात सुनता है और अपने घर की ओर चल देता है। 

मछली चाची की बतायी बात से भी उसे कोई फर्क नही पड़ता। घर वाले भी उसे पढ़ने के लिए बोलना बंद कर देते हैं। परीक्षा में कुछ ही दिन बचे होते हैं। तपन अब परीक्षा की तैयारी शुरु करता है। पर उसे पाठ समझने में परेशानी आती है। परीक्षा का दिन भी आ जाता है पर तब भी उसका कोर्स कम्पलीट नही होता है। उसे घबराहट होने लगती है,पर अब वो कुछ नही कर सकता। किसी तरह परीक्षा देता है। जब रिजल्ट आता है तो वह फेल हो जाता है। 

वो रोते रोते उसी नदी के पास जाता है और मछली चाची को आवाज लगाता है, मछली चाची उसकी आवाज सुन कर बाहर आती है। उन्हें देखते ही तपन रो रो कर कहता है चाची मैंने फेल हो गया। मुझे आपकी बात समझ में आ गयी. मैंने न अपने घरवालों और न ही आपकी बात पर ध्यान दिया मुझे समझ आ गया कि जितना खेलना जरुरी है उतना पढ़ना भी जरुरी है. दोनों में तालमेल बना कर रकहना चाहिएमछली चाची उसे प्यार करते हुए कहती हैं चलो अब सब भूल कर वार्षिक परीक्षा की तैयारी करो और हाँ केवल पढ़ाई ही मत करना उसके साथ साथ खेलने के लिए भी समय रखना। तभी ओर अच्छे से पढ़ पाओगें।तपन ने मन ही मन ठान लिया कि वह अब रोज खेलेगा भी और पढ़ाई भी करेगा. 


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