उपासना बेहार
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थोड़ी दूर जाने के बाद ही अचानक बस का टायर पंचर हो जाता है. बस के ड्राइवर अंकल स्कूल में फ़ोन कर इस घटना के बारे में बतातें हैं और सभी बच्चों को बस में ही रहने का कह कर कंडेक्टर अंकल के साथ मिल कर टायर बदलने लगते हैं. रानू खिड़की के बाहर देखती है तो उसे एक झुग्गी बस्ती देखती है, वहाँ एक घर के सामने दो बच्चे खेल रहे थे, तभी वो बच्चे आपस में एक फटी गुड़िया से खेलने को लेकर लड़ पड़ते हैं. रानू देखती है कि जिस गुड़िया के लिए वो दोनों झगड़ रहे थे उसका एक हाथ नहीं है, वहाँ से रुई निकली हुई है और उसके कपडे भी बहुत गंदे हैं. रानू सोचती है कि ‘अरे ये बच्चे इतनी गन्दी और फटी हुई गुड़िया के लिए क्यों लड़ रहे हैं, आखिर इनके माँ-पापा इन्हें खिलौने ला कर क्यों नहीं देते हैं.' उसके मन में ये सवाल उठने लगता है.
जब वो स्कूल पहुँचती है तब
भी इन्ही सवालों में उलझी रहती है. जब उसे अपने सवालों के जवाब नहीं मिलते तो अपनी
क्लास टीचर मिस नेंसी को पूरी घटना बताती है तब क्लास टीचर समझती है कि
“उन बच्चों के माँ–पापा के पास पैसे नहीं होंगे. इस कारण वो उनके लिए खिलौने नहीं
खरीद सकते होंगे लेकिन ये हम लोगों की जिम्मेदारी है कि ऐसे बच्चों की मदद करें". रानू
कहती है “मिस मैं भी उनकी मदद करना चाहती हूँ, आप बताईये कि मैं कैसे करूँ?” मिस
नेंसी उसे कहती है “तुम्हारे पास तो बहुत सारे खिलौनें होंगे जिनके साथ खेलती नहीं
होगी, वो सारे खिलौने उन दोनों बच्चों और वही के ओर बच्चों को दे सकती हो लेकिन
ध्यान रखना खिलौने खराब नहीं होने चाहिए, अगर तुम उन्हें खराब खिलौने दोगी तो वो
दुखी हो जायेगें. जबकि तुम्हें उन बच्चों को ख़ुशी देनी है ना की दुःख.”
रानू शाम को घर पहुँचते ही
अपने कमरे में जा कर खिलौनों को देखती है, उसकी एक अलमारी पूरी की पूरी तरह तरह के
खिलौनों से भरी है. वो सभी के सभी अच्छे है. कई तो ऐसे हैं जिन्हें कभी खेला ही
नहीं है. वो मन ही मन निर्णय लेती है.
रात में जब पापा घर आते हैं
तो वो माँ और पापा के पास जा कर आज के घटना के बारे में बताती है और कहती है “माँ उन
बच्चों के पास खिलौनें नहीं हैं जबकि मेरे पास ढेर सारे खिलौनें हैं, मैं कल अपने
जन्मदिन पर उन बच्चों को वो खिलौनें देना चाहती हूं. मुझे तो शाम में फिर से मिल
जायेंगे, पर उनकों देने वाला कोई नहीं है.” माँ-पापा उसकी बातें सुन कर बहुत खुश
हो जाते हैं और उसे प्यार से गले लगा लेते हैं.
दूसरे दिन सुबह रानू अपने माँ-पापा
के साथ उस बस्ती में जाती है और सभी बच्चों को खिलौने बाँटती है. बच्चे खिलौने पा
कर खुश हो जाते हैं और उसे जन्मदिन की बधाई देते हैं. वो समझ जाती है कि जीवन की
असली खुशी देने में है, लेने में नहीं. वो बहुत खुश हो जाती है.

बहुत सुंदर सीख देती कहानी।
ReplyDeleteशुक्रिया दोस्त
DeleteNacho ko help ketne ki Sikh milti h story se
ReplyDeletethanks
ReplyDeletemushkil sabak bhi aasani se samjhana koi aapse seekhe!!!!
ReplyDeletekeep it up!!!!