Thursday, April 23, 2020

बाल कहानी - रुपेश की धरती और चाँद बाबा



 उपासना बेहार
Image Courtesy - Google.com
रुपेश को आज चाँद पर निबंध लिखने का गृहकार्य मिला था. उसने सोचा कल छूटटी है तो पापा से मदद लेकर लिखूंगा और वो खाना खा कर सोने चला जाता है. आधी रात में रुपेश को जोर की आवाज सुनायी देती है. वो खिड़की से बाहर देखता है कि चाँद से एक सफ़ेद सीढ़ी उसके आँगन तक आई हुई है, वो तुरंत बाहर निकलता है और सीढ़ी चढ़ने लगता है. सीढ़ीयां चढ़ कर वो चाँद पर पहुँच जाता है. वहाँ पहुँच कर वो देखता है कि चारों तरफ हरियाली ही हरियाली है, खूब सारे बड़े बड़े पेड़ लगे हैं.

इन हरियाली के बीच उसे एक रास्ता दिखायी देता है, वो उस रास्ते पर चल पडता है. आगे बढ़ने पर उसे रंगबिरंगी तितलियाँ दिखती हैं जो एक फूल से दूसरे फूल में बैठ रही थी, सुंदर सुंदर पक्षीयां उड़ रही थी, उसने ऐसे पक्षी कभी नहीं देखे थे. रुपेश जैसे जैसे आगे बढ़ता जाता है चाँद के यहाँ की खूबसूरती देख मोहित होता जाता है.

तभी उसके चेहरे पर पानी की बुहार आने लगी और पानी के गिरने की जोर-जोर सी आवाज सुनाई दी. उसने आगे बढ़ कर देखा तो वहाँ विशाल झरना था, इतना साफ पानी तो उनसे कभी देखा नहीं था. उसकी बस्ती में तो पानी को लेकर कितनी मारामारी होती है. बस्ती में एक टेंकर आता है उसी से सब पानी भरते हैं, बहुत लम्बी लाईन लगती है, उस समय कई बार लड़ाई हो जाती है, कल ही तो शारदा आंटी और विमला आंटी में झगड़ा हो गया था और शारदा आंटी ने विमला आंटी के सर पर स्टील का मटका मार दिया था. विमला आंटी के सिर से खूब खून निकला, उन्हें अस्पताल ले जाना पड़ा. यहाँ तो कितना सारा पानी है काश ये पानी वो बस्ती में ले जा पाता तो पानी की समस्या हमेशा के लिए दूर हो जाती.

वो इस अचंभित कर देने वाली दुनिया में खो ही गया था कि अचानक एक सफ़ेद कपडे पहने लम्बी दाढ़ी वाले बुजुर्ग दिखाई दिये, वो उनके पास जा कर पूछता है “आप कौन हैं?” बुजुर्ग कहते है “मैं चाँद बाबा हूँ और ये चाँद मेरा घर है, तुम कौन हो?”, “ बाबा मैं रुपेश हूँ और धरती पर रहता हूं, आपका चाँद तो बहुत ही खुबसूरत है, मैंने पहले कभी ऐसे सुंदर पक्षी और तितली धरती पर कभी नहीं देखे.” 

चाँद बाबा कहते है “तुम्हारे धरती पर इससे भी सुंदर पक्षी, तितली, जानवर और ढेर सारा साफ़ पानी था.” रुपेश को विश्वास नहीं होता, वह पूछता है “अगर ऐसा है तो ये सब कहाँ चले गए?” बाबा कहते हैं “धरती के लोगों ने अपने यहाँ के पेड़ों को काट दिया, जंगल ख़त्म कर दिए. इन पशु,पक्षीयों का घर यही पेड़ और जंगल ही तो हैं. जब इनका घर ही नहीं रहेगा तो ये कैसे जीवित रह सकते हैं, पेड़ काटने से पानी भी बरसना कम हो गया. तुम्हारे लोगों ने पानी की बहुत बर्बादी की और जो नदियों थी उसमें भी फैक्ट्रियों की गंदगी मिलाने लगे.”
रुपेश ने दुखी होते हुए कहता है “ धरती के लोगों ने ये बहुत गलत काम किया है”
बाबा ने उदास हो कर कहा “ और सुनने में आ रहा है कि धरती के लोग चाँद पर भी घर बनाने वाले हैं. अब वे मेरे इस प्यारे घर को भी बर्बाद करने वाले हैं.”

रुपेश के आँख में आंसू आ गये “चाँद बाबा कुछ भी हो जाये मैं आपके घर को मिटने नहीं दूगां. इन पक्षी, जानवरों को ख़त्म नहीं होने दूगां. आप मुझे इसका कोई हल बतायें.”

बाबा ने अपनी सफ़ेद लम्बी दाढ़ी पर हाथ फेरते हुए कहा “इसका एकमात्र उपाय यह है कि धरती के लोग पेड़ों को ना काटें, खूब सारे पेड़ लगायें, बहुत सारे तालाब बना कर बरसात के पानी को इकट्ठा करें और नदियों में गंदा पानी ना डालें. ये सब करेंगे तो देखना तुम्हारी धरती भी पानी से लबालब और हरी भरी हो जायेगे, फिर वहाँ भी सुंदर सुंदर तितली, पक्षी और जानवर होंगे. धरती पर भी इतना साफ़ पानी मिलेगा और तब धरती के लोग मेरे घर पर कब्ज़ा नहीं जमायेगें.” रुपेश खुश हो कर कहता है “आप सच कह रहे हैं बाबा.”
बाबा रुपेश को प्यार से गोद में बैठाते हुए कहते हैं “हाँ बेटा, ये सच है. अच्छा अब तुम अपने घर वापस जाओ. सब परेशांन हो रहे होगें.” बाबा उसे सीढ़ीयों के लेकर आते हैं.

रुपेश सीढ़ीयां उतरते हुए चाँद बाबा से वादा करता है कि वो धरती में जा कर अपने लोगों को ये बात समझायेगा. तभी सीढ़ी जोर जोर से हिलने लगती है और उसकी आंख खुल जाती है, देखता है उसकी माँ उसे जोर जोर से हिला कर उठा रही है. वो आश्चर्य से माँ को देखता है फिर ऊपर आसमान को. वो सोचता है ‘तो क्या वो एक सपना था, लेकिन चाँद बाबा ने जो बातें बतायी, उन्हें मैं सब को बताऊँगा और हम सब मिल कर धरती को हरा भरा कर देगें'. रुपेश मुस्कुराता हुआ उठ कर तैयार होने लगता है.
  

     
    

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